कुछ लम्हे जिंदगी के हमारे नाम कर दो…….

कुछ लम्हे जिंदगी के हमारे नाम कर दो ,
यूं किस्सा-ए-मुहब्बत बहार-ए-आम कर दो ,

तपीश सूरज की अब हमसे सही नही जाती ,
तुम ज़ुल्फ़ बिखरा दो और अंधेरी शाम कर दो ,

बेसाख्ता बर्बाद क्यूँ कर हों ये यूँ ही ,
मेरे इन आंसुओ को छलकता जाम कर दो ,

चलो अब फिरसे उठा लो खंज़र जफा का और ,
किसी चौराहे पर मेरा कत्ल-ए-आम कर दो ,

बहुत नाम सुना है मुहब्बत का ईस जहां में ,
कुछ ऐसा करो मुहब्बत को बदनाम कर दो ,

खुद के लिए तो कुछ कर न सके “शादाब” मगर ,
दूसरों का हो भला कुछ ऐसा ही काम कर दो !!

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