नया सवेरा

दिनकर पर छाई लालिमा की लाली

पर्वत पर छाई है घटाएं काली

प्रकृति लग रही है मन को लुभाने वाली

वसुंधरा पर छाई है हरियाली

लगती है प्यारी तरु-वृक्षों की मुस्कान

प्रकृति सुना रही खग-पक्षियों का गान

बादल छेङने लगे हैं रिमझिम की तान

इस वेला की यही है पहचान

उदय होगा पूरब में सूरज नवेला

ऐसी है इस सुबह की वेला

इस वेला में ही है हम सबका बसेरा

हर्षोल्लास लिए आया है ‘नया सवेरा’

-“गोपी”

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