कवि और कल्पना

मैं तो कवि नहीं

पर कविता जरुर लिखता हूं

बस यूं ही रिक्त समय में

कल्पना लोक में विचरता हूं

मां शारदा की करता हू

आराधना

कल्पना करना ही है

मेरी साधना

वृक्ष का पता हिलता है

या कहीं पानी बरसता है

मैं इन सब में

ढूंढ लेता हूं उसे

साधना में ढूंढते हैं

योगी जिसे

कोयल की कूक

सुन्दर पक्षी मोर

कल्पना शुरु होती है

निकलते ही भोर

जब आसमान में

घटाएं छा जाती

तो मेरी कल्पनाएं

ललचाती

प्रकृति के हर रूप पर

करने लगता हूं विचार

इस विमर्श विचार का

कल्पना है आधार

इस कल्पना आधार से

अहिर्निश बिलखता हूं

मैं तो कवि नहीं

पर कविता जरुर लिखता हूं

 

-“गोपी”

 

 

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