कृष्णमय मीरा

मन मेरा कृष्णा  कृष्णा गाये

इसमें ना कोई और समाये

बाजत ढोल मृदंग मजीरा

बंशीधर में रम गई मीरा

मेरे गिरधर मैं गिरधर की

छोङी मैंनें राह नगर की

 कृष्ण की हुई मीरा,  कृष्ण है साया

 कृष्ण में रमी मीरा,  कृष्ण में प्राण समाया

मन मीरा का पुकारे  कृष्णा

 कृष्ण-मिलन से मिटे तृष्णा

जगत सारा लगता पराया

दुनियां भूली  कृष्ण पाया

ईश-भक्ति में राजमहल छोङा

दीन-दुनियां से नाता तोङा

 कृष्ण नाम हरता सब पीङा

धन्य-धन्य है ‘ कृष्णमय मीरा’

-“गोपी”

 

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