नहीं कोई मुकाम आया

मुझे तब कहां आराम आया

बेवफाओं में जब मेरा नाम आया

निकले थे इश्क में नाम करने

नतीजे में खुद को बदनाम पाया

वो हमसे आंखें चुराकर चले गये

ख्वाबों में उनका सलाम आया

आंखों को समझ बैठे मयखाना

हमनें खाली अपना जाम पाया

भूल जाओ याद ना आओ

मशविरा उनका काम आया

खत पर खत लिखे बेशुमार

मगर न उनका पैगाम आया

सफर प्यार का चलता रहा लेकिन

नहीं इसका कोई मुकाम आया

सच्चाई छुप गई बनावटी उसूलों में

गुमनामों में “गोपी” जब तेरा नाम आया

-रामगोपाल सांखला “गोपी”

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  1. pankaj kumar sah pankaj kumar sah 14/09/2012

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