देखो ,फिर साँझ हुई

देखो ,फिर साँझ हुई

घूम रहा बघेरा !

मानस और तापस उतर रहे उपर से

गीतों के संग लिए मीठे सौगात

उमड़ रही बदरी ,छाया अँधियारा

गायों और भेड़ों के उलझ गए पावँ

ले लो मशाल ,चलो करे हरकारा

देखो ,फिर साँझ हुई

घूम रहा बघेरा !

पत्ता-पत्ता होशियार,मौसम थर्राया

पास वाली टीला पर लगता कोई आया

सूरज तो छिप गया ,आया नहीं चाँद

रात के अँधेरे में डर एक समाया

उल्लू ने उड़कर अँधेरे को ललकारा

देखो ,फिर साँझ हुई

घूम रहा बघेरा !

डरा हुआ मन ,है जंगल का राज

आजु-बाजु घात में दिखता है बाज

हमने तो सोचा था नेह भरा मौसम

ऊँची-नीची राहों पर जीवन का सरगम

हिंसक पराव बना ,रोता मन बनजारा

देखो ,फिर साँझ हुई

घूम रहा बघेरा !

 

कट रहे पेड़ और जंगल उजड रहे

छिप रही हिरणियाँ ,हैं तीर चल रहे

सुबक-सुबक गंदला गया झरने का पानी

सियासती दाव पर जंगल की रवानी

रखवालों की गश्ती पर भी लग रहा पहरा

देखो ,फिर साँझ हुई

घूम रहा बघेरा !                                           12.09.12

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  1. suman chouhan 16/04/2014

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