न जाने किसे पुकारता हूँ !

 

न जाने किसे पुकारता हूँ.

“खुदा नहीं है ”

ये औरों से कहता हूँ.

‘ख़ुद’ न जाने किसे पुकारता हूँ .

मंदिर – मश्जिद, गिरजे – गुरूद्वारे,

माथा टिकते देख

मन – ही – मन हँस लेता हूँ .

दुनिया को, अंधविश्वास का,

जीवित रूप कह देता हूँ.

परन्तु, अचानक, ये क्या…

दुःख की हलकी आहट पाकर

पता नहीं किसके आग़ोश में

छुपकर सो जाता हूँ.

फिर, साहस पाकर पुनः

उसी रंग में ढल जाता हूँ.

“खुदा नहीं है ”

ये औरों से कहता हूँ.

‘ख़ुद’ न जाने किसे पुकारता हूँ .

 

Leave a Reply