सोयी नहीं रात भर..

 मैं जगती रही तेरे ही ख़्यालो में रात भर ,
कल रात थकी तो बहोत थी मैं.. 
पर सोयी नहीं रात भर..
ना ख़्वाब आये  , ना ख़्वाब में तुम ,
नींद दरवाज़े पर खड़ी रही, में पड़ी रही ग़ुम सुम..  
कभी रोई, कभी मुस्कुराई., फिर ख़्यालो में थकी  रात भर…

घड़ी की  टिक-टिक, तमरों की तम-तम ,
रात बीतती रही, मेरा वक़्त गया था थम..
फिर दस्तक़ दी भोर ने, यूँ  कब दिन,वार बदल गये , 
मुझे पता भी न चला रात भर …
कल रात थकी तो बहोत थी मैं , 
पर सोयी नहीं रात भर…                          kajal sky….

2 Comments

  1. nak 11/09/2012

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