पल भर का करार

तू छुपी है कहां सनम? तू यादगार यहां
महरूमी किस्मतका मारा, बेक़ारार यहां

फासले कितने!  खामोशी कैसी ! रहम कर
बीती बातों की यादों से तेरा इंतज़ार यहां

माहोल भी है अजीब, क्यों मैं हू कमनसीब ?
दीदार-इ-तमन्ना, तेरे आने का इनकार यहां

हाल-इ-दिल हसरत इस भरी महफ़िलमें क्यों?
आये तो कितने, मगर तुजसा हँसी यार कहां ?

परवाना हू, दीवाना भी, आस लिए बैठा हू
आजा शमा, जलाने, पल भर मिले करार यहां.
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जनक देसाई  १२/२९/२०११

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