” देखा ” / निष्कर्ष

दिये से झोंपड़ी को रोशन होते देखा ,
देखा सूरज को बादल में छिपते हुये|

देखी बाढ, देखी बंजर जमीं,
पाक नदी ने बनाया जिसे झर्झर|
देखा उसी नदी को ,
समुन्दर कि गोद में खोते हुये|

पढी कुरान , गीता पढी,
समझी हमने बाईबल भी,
देखा एक कवी को
भ्रष्ट समाज पर रोते हुये|

मन्दिर देखे , गिरीजाघर देखे
देखी हमने मस्जिद भी
देखी हमने मधुशाला
देखा मदीरा को पुजते हुये |

क्या देखे इस दुनिया को “कौशल” ?
अपनी आंखों , अपनी आत्मा से |

देखा हमने तरक्की कोकर
दुस्साहस की आग में जलते हुये |

5 Comments

  1. Yashwant Mathur 10/09/2012
  2. virendra sharma 10/09/2012
  3. रोली पाठक 10/09/2012
  4. Kavita Rawat 10/09/2012
  5. Manisha 27/02/2014

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