अजब हेरान हूँ मै

अजब हेरान हूँ मै,भगवन तुझे कैसे रिझाऊँ मै

कोई वस्तु नही ऐसी,जिसे सेवा में लाऊं मै

हो मूर्ति में तुम व्यापक,तुम हो फूलों में
फिर भला भगवान पे,कैसे भगवान चढाऊँ मै
तुम्हारी जोत से वाकिफ,(यह/हैं) सूरज चाँद और तारे
महा अंधेर है भगवन,अगर दीपक जलाऊँ मै
भुजाएँ हैं न सीना है, न गर्दन है न पेसानी
तुम हो निर्लेप नारायण,कहाँ चन्दन लगाऊं मै
लगाना भोग कुछ तुमको,यही अपमान करना है
खिलाता है तू सब जग को,तुझे कैसे खिलाऊँ मै
( लेखक: अनवर खान ) दिनांक: 04/09/2012

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