स्वर्ण पिंजर

सोने के पिंजरे में एक दंभी तोता रहता था

कोई आये मेरे संग हमेशा यह कहता था

दंभी तोता जुटाकर ज्ञान

ले आया एक तोता सुजान

अब दंभी का मन भरमाया

पिंजरे में एक सुनहरी मैना को ले आया

दंभी तोता बङा ज्ञानी अभिमानी

करता रहता सदा अपनी मनमानी

सुनहरी मैना थी बङी सयानी

दंभी से बतियाती मीठी बानी

लगती थी अबोध बालिका भोली भाली

जिज्ञासु बन कुछ ज्ञानी बनी मतवाली

सुनहरी अल्प ज्ञान में यूं इठलाती

ज्यों अधजल गगरी छ्लकत जाती

दंभी और सुनहरी बातें करते भरपूर

सुजान चाहता था उनसे रहना दूर

एक दिन दंभी तोता ने कैसा खेल रचाया

स्वर्ण पिंजर में एक छबीला तोता ले आया

छबीले का यथा नाम तथा रूप रंग काम था

वह स्वर्ण पिंजर के कायदों से अनजान था

छबीले ने सीखे स्वर्ण पिंजर के कायदे

इससे मिले उसे लोक जीवन के फायदे

दंभी तोता, सुनहरी मैना, छबीला और सुजान

रहते थे बङे प्रेम से एक परिवार समान

युं चलते-चलते स्वर्णिम वक्त बीता

सुनहरी ने दंभी का विश्वास जीता

सुजान करता दम्भी-सुनहरी को सचेत

कहता था कहीं पङ ना जाये ‘हेत में रेत’

सुनहरी मैना दंभी तोता की बनी राजदार

दोनों में परस्पर बढा भरोसा अपार

जब होता विश्वास भंग तो खेद होता है

गलत फेहमियों से ही मतभेद होता है

विश्वास का पर्दा होता है झीना

एक दिन दम्भी ने सुनहरी से राजपाठ सब छीना

उसी दिन सुनहरी और दंभी के अहंकार में ठन गई

सुनहरी मैना की भृकुटियां दम्भी पर तन गई

सुनहरी – दम्भी दो पाटों के बीच फंसी जान

त्राहिमाम त्राहिमाम करता रहा सुजान

तोता सुजान ने सुलह के पूरे किये प्रयास

पर नहीं जमा सका दोनों का पुराना विश्वास

सुजान के प्रयासों का असर नहीं उन पर जरा

दंभी सा दंभ सुनहरी में भी था भरा

कुछ-कुछ बर्फ पिगली सुजान की बातों से

न जाने कौन खेलता था किसके जज्बातों से

कुछ दिन अमन फिर जंग का ऐलान हुआ

इनकी हठधर्मिता से व्यथित सुजान हुआ

एक घमंडी से दूसरे का घमंड टकराया

सुनहरी को दंभी ने स्वर्ण पिंजर से बाहर कराया

सोने का पिंजरा छूटने से मैना को हुआ दुःख अपार

सुजान और छबीले से मिलने आती बार-बार

बाहर मनवा ना लागे, सुनहरी का मन भरमाये

मिठुओं से मिलने मैना, स्वर्ण पिंजरे में आये

दम्भी तोते की तकरार से मैना भयी विकल

सुनहरी ने छबीला पर दौङाई अपनी अकल

छबीला स्वभाव में सुनहरी के ही सम है

‘बातों का बादशाह’ मैना से नहीं कम है

दम्भी पूछे सुजान से क्यों है ये अंधी दौङ

अब आता है कहानी में नया मौङ

सुनहरी अवसर पाकर, स्वर्ण पिंजर में जाती है

छबीले को मीठी-मीठी बातों से बहलाती है

छबीले को छलने लगी, प्यारी-प्यारी बतियां

बजने लगी उनके दिमाग में हजारों घंटियां

बातों ही बातों में बातों का सिलसिला आम हुआ

चहुंओर छ्बीला – सुनहरी का नाम हुआ

फुर्सत के लम्हे दोनों बिताते मुंडेर पर

जैसे बैठे हों जान बूझकर बारूद के ढेर पर

दम्भी से छुटकारा पाया, भूली कुटुम्ब कबीला

नील-गगन में उङते मिले, सुनहरी संग छ्बीला

सुनहरी-छबीले का मेलजोल बढता जाता

अनिष्ट की शंका से दम्भी का सिर चकराता

दम्भी सोच-समझकर बोला सुजान से

मुझे सही राह दिखाना धर्म-ईमान से

क्यों छबीला-सुनहरी के किस्से आम हो रहे हैं

यों संग-संग हम भी बदनाम हो रहे हैं

यह सुन बोला सुजान, दम्भी यूं ना शौर करो

देखो और प्रतीक्षा करो, इतना ना तुम गौर करो

यह सुन-समझ दम्भी ने मौन साधा है

अधिक मौन से भी होती, छबील-सुनहरी को बाधा है

कहे सुजान सुन सुनहरी, क्यों करती भूलें बार-बार

इन नादानियों से तो, मर्यादाएं होती तार-तार

अंधी आजादी में क्यों सीमाएं भूलती हो

छोङकर शीतल छांव क्यों तूफानों में झूलती हो

कुछ-कुछ समझी सुनहरी बातें सुजान की

ठानी उसने जीऊंगी जिन्दगी मैं शान की

सुनहरी चली अपनी राह विचारों में खोई है

ऐसे दम्भी सुजान छबीले हम जैसे ही कोई है

हर कोई यहां संसार के झंझावातों में लथपथ है

यहां चलना सम्भलकर यह जीवन अग्निपथ है

3 Comments

  1. Durgesh Singh 08/09/2012
  2. ashu 11/09/2012
  3. Jagmal Dahima 11/09/2012

Leave a Reply