कहाँ खो गया है आदमी ? (गीत)

अरमानों की लाशें कितनी, ढो रहा है आदमी..!
मायूसी के भँवर में कहाँ, खो गया है आदमी ?

अंतरा-१.

खिलखिलाता मातम जहाँ, आँसू बहाती ख़ुशियाँ..!
मनचाही सौगात पाकर भी, रो रहा है आदमी ?
अरमानों की लाशें कितनी, ढो रहा है आदमी..!

अंतरा-२.

ज़िच राह भटकना यहाँ, नित जीना, नित मरना है..!
सादगी का दम भर कर, चरम सो रहा है आदमी..!
अरमानों की लाशें कितनी, ढो रहा है आदमी..!

(ज़िच राह= लाचारी भरी ज़िंदगी; नित= रोज़; चरम= अंतिम )

अंतरा-३.

है शग़ल का हाल खस्ता, महँगा पानी, खून सस्ता ?
तभी तो आस्तीन, इलीस की धो रहा है आदमी..!
अरमानों की लाशें कितनी, ढो रहा है आदमी..!
(शग़ल= रोजगारी; खस्ता=ख़राब)
(इलीस की आस्तीन= शैतान की लहूलुहान बाँह)

अंतरा-४.

वसीयत लिखें फ़ज़ीअत की तो, क्या लिखे ये आदमी ?
अवम कवल, अंगी को देकर ,खुश हो रहा है आदमी..!
अरमानों की लाशें कितनी, ढो रहा है आदमी..!

(फ़ज़ीअत= दुर्दशा; अवम= आख़री; कवल= निवाला; अंगी=नेताजी)

मार्कण्ड दवे । दिनांकः०७-०९-२०१२.

Leave a Reply