वाणी है मौन ….

 

वाणी है मौन भीतर कोई विचार चल रहा है

यह विचार बली होकर अनवरत मुझे छ्ल रहा है

क्या पीङा लिये फिरते हो मन मे

क्यो रहते हो सदेव किसी उधेङ्बुन मे

कैसे तूफान छुपा लेते हो जहन मे

क्यो चलते जाते हो अपनी ही धुन मे

लगता है यहा अपना कोई अपनो को छल रहा है

वाणी है मौन ….

क्यो फिकर कर रहा हू मे संसार की

क्या परिभाषा हो गई है प्यार की

क्या मर्यादाए नही किसी घर द्वार की

क्यो सोचता हू मै जीवन के सार की

क्यो क्या कैसे का प्रश्न रह रह फल रहा है

वाणी है मौन……

खामोश है लब आन्खे कुछ कहती है

ये निर्दोश आन्खे क्या क्या गम सहती है

क्यो गम मे भी बनावटी मुस्कान रहती है

रिश्तो की बुनियाद इसी भ्रम मे ढहती है

सर्द आहे बाहर अन्दर कैसा भाव उबल रहा है

वाणी है मौन……

क्या परवाह नही मुझे दुनिया के उसूलो की

क्यो पुनरावर्ती कर रहा मै भूलो की

काटों भरी राह भी क्यो लगती है फूलो की

क्यो चिन्ता नही मुझे जहान के उसूलो की

क्यो शब्द बाण किसी के सीने पर चल रहा है

वाणी है मौन……

 

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  1. Anil RaghouChetan 09/09/2012

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