रोते रहे हम….

रोते रहे हम याद में उनके

वो करवट बदल कर सो गए

 

ढूंढते रहे हम उन्हें खाबों में

ना जाने कहाँ वो खो गए

 

फ़कत गुजरे थे चार दिन

वो जुदाई के बीज बो गए

 

मैं जलाता रहा शमा- ए- मुहब्बत

वो किसी और के हो गए

 

सुना है आँखे नम थी उनकी भी

शायद खानापूर्ति को रो गए

 

यूँ ही जलता रहा ‘पंकज’ मोहब्बत में

लौटे नहीं वो अब तक कब के जो गए

 

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