तेरे वगैर

बहुत मुश्किल है /तेरे वगैर जीना |
भरमता ही रहा /पहाड़ की तलहटियों में
नदी के किनारों के संग
नदी भी चलती रही /साथ-साथ ज्यों गुम;
किनारों से टकराकर /लहरें करती रहीं अठखेलियाँ
चलता रहा मैं अकेला /बसाए मिलन की तम्मना
बहुत मुश्किल है /तेरे वगैर जीना |

मेरी आँखें तलाशती रही /उस बोल उठने वाली आँखों को
जो मेरे मन को हरा-भरा कर /पूर्ण ताजगी देती है ;
सुर्ख परों वाले राविन पक्षी /की तरह हो तुम
तुम्हारे वगैर
उलझनें बन जाती हैं गाठें /जो खुलती नहीं
मेरे शब्द गूँगे हो जाया करते हैं ;
तन-मन की प्यास को / भला नहीं यों लहरों में डुबोना
बहुत मुश्किल है /तेरे वगैर जीना |

जब-जब मैंने /कलम उठाने की सोची है
मेरे मन ने ,आत्मा ने ,हाथ ने तुझे तलाशा है ;
तुम्हारे न रहने पर ही /मैंने जाना है कि
खुले में दम कैसे घुटता है ?
एक अच्छा-खासा इंसान /अकेले में बैठकर क्यों रोता है ?
उस दिन भी मैं
उगते सूरज की ओर /समुद्र किनारे दूर-दूर तक
मंजिल की पथरीली राहों पर /दौड़ने का संकल्प लेकर
निकल पड़ा था /किन्तु /जल पर पड़ने वाली
सुनहरी किरण रेखाएं /मुझे तीखी लगने लगी थी
और मैं लौट आया था हताश
कठिन लगने लगा था /तुम्हारे बिना सफर का पूरा होना
सच ! मेरे विश्वास !
बहुत मुश्किल है /तेरे वगैर जीना |

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