किसान / निष्कर्ष

डूबा सूरज की आँखें लगी थी बुझने,
उसकी चाल में थी लडखडाहट
उसका मन चला मचलने |

उसकी हालत देख एक सैलाब उठा,
उस अधेड को पहचानने मन चला |

मैं जानना चाहता था,
उस व्यक़्तित्व को |
बैलों पर झुके,
हल से बने स्वमित्व को |
जिसकी आखों में था नशा,
मदिरा का नहीं
मेहनत का |

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