रिश्ते / निष्कर्ष

मैनें रिश्तों को बिखरते देखा है,
कुछ फ़ायेदों, कुछ कायेदों के लिये|
सुविधाओं के लिये, बुनियादी आवयश्कताओं के लिये
मैने रिश्तों को टूटते देखा है|

जैसे चला वो कम्पन, भूकम्प माना चलो,
गिरा गया सोने की ईंटों के महल|
मैनें रिश्तों को ढहते देखा है,
उन गुम सुम ईमारतों सा|

मैने उस खून को उबलते देखा है,
जिसकी तपिश सह ना सका दिवाकर भी|
मैनें रिश्तों को डूबते देखा है,
उस सूर्य सा, बादलों की ओठ में|

चन्द किफ़ायतों के नाम पर
चन्द हिदायतों के दाम पर,
मैनें रिश्तों को बिकते देखा है|

 

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