यह निशानी किसकी है ?

आसमाँ नीले गुब्बारे की तरह उड़ गया
सूरज पतंग की तरह ताड़ पर आ लटका
ज़मीन तांबे की हो गयी
सारा शहर मुर्दा हो गया

कहते हैं ये निशानी क़यामत की है .
इक दिन मैं ने देखा ख़्वाब में
आसमाँ को लहराते नीले दुपट्टे की तरह
चाँद को चमकते हीरे की तरह
सूरज को दमकते सोने की तरह
ज़मीन को सतरंगीन क़ालीन की तरह
इन्सान को हँसते , ज़िंदगी की तरह
बताओ यह निशानी किसकी है ?
(खुर्शीद हयात )

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