दिल से

दिवार से मेरा नाम मिटा तो दोगे पर, दिल से कैसे..!

याद आऊँगा फिनिक्स बन कर, आये वो जल कर जैसे ।

 

तहज़ीब का तकाज़ा यही था, कुछ तुम कहो, कुछ हम कहें ।

तंग तश्‍नगी, बन गई बंद अलार, दरमियाँ खुल कर कैसे..!

दिवार से मेरा नाम मिटा तो दोगे पर, दिल से कैसे..!

 

बेसब्री ने ठाना था, मिलने का कोई बहाना तो मिले..!

आरज़ूओं का गला घोंट गई वस्ल, गले मिल कर जैसे ।

दिवार से मेरा नाम मिटा तो दोगे पर, दिल से कैसे..!

 

चश्मदीद गवाह माँग रहा है, ज़ालिम ज़माना लेकिन..!

क़ातिल निगाहों ने किया है छल, सँभल-सँभल कर कैसे..!

दिवार से मेरा नाम मिटा तो दोगे पर, दिल से कैसे..!

 

उम्रभर ढूंढा, हुश्नो – इश्क का सरमाएदार , अब तो..!

उम्र सारी घुल गई, वक़्त के अंधेरों में, गल कर जैसे ।

दिवार से मेरा नाम मिटा तो दोगे पर, दिल से कैसे..!

 

(phoenix=फिनिक्स= एक पक्षी, जो सुर्य को पाने की चाह में, बार-बार जल कर फिर से ज़िंदा हो जाता है । ) ( जल के = सुलग कर)

(तहज़ीब= शालीनता; तकाज़ा= स्मरण कराने की क्रिया ; तशनगी= प्यास;
अलार= दरवाज़ा)

(बेसब्री=अधीरता; आरज़ू=इच्छा; वस्ल=मिलन)

(चश्मदीद= प्रत्यक्षदर्शी )

(सरमाएदार= पूँजीपति; गलना=पिघलना)

 

मार्कण्ड दवे । दिनांकः- २१-०८-२०१२.

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