फिर एकबार…

जब-जब  उम्मीद बनती है

लोगों का लोगों पर

विश्वास जागता है

सामने से कोई पत्थर आता है

और तमाम

सुरक्षा घेरे को तोड़ता हुआ

इंसानियत के माथे पर पड़ता है

उसे लहूलुहान कर देता है

दिलों में नफ़रत और गुस्सा

पनपने लगता है

 

कुछ दिन बाद

फिर एक आस जागती है

शायद यही आखरी पत्थर हो

इस बार

हम उसे अवश्य पकड़ लेंगे

फाँसी पर चढ़ा भी देंगे

पर नहीं

वह फिर आता है

बार-बार आता है

अदृश्य हाथों द्वारा फेंका गया पत्थर

इंसानियत को लहूलुहान कर निकल जाता है ।

 

फिर कई महीनों का तांडव चलेगा

कई कमेटियाँ

बनेंगी-टूटेंगी फिर बनेंगी

अदृश्य हाथों को ढूँढने का

लम्बा सिलसिला चलेगा

अपनों की मौत का दर्द लिए

लोग कोर्ट कचहरी के चक्कर कटेंगे

हालांकि पहले से तय है …

सबका बइज़्ज़त बरी होना

क्योंकि हर कोई

किसी न किसी पार्टी का गुंडा है

अदृश्य हाथ हँसेगा

ख़ुद को शाबाशी देगा

अपनी काबिलियत पर ख़ुश होगा

और हम

फिर ठगे-लूटे जायेंगे

हर बार की तरह ।

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