ग़ज़ल

वह तेरी हंसी थी , वह कैसा समां था
मुअत्तर तेरी ज़ुल्फ़ से गुलसितां था ,

हिनाई सफ़र था , चमन नग़मा ज़न था
मेरी जिंदगी में तू रूह ऐ रवां था ;

ना जाने है क्यों , मुझ से तू बदगुमाँ अब
ये कैसा समां है वो कैसा समां था ;

न था दरम्यान फासला कोई अपने

नहीं कुछ निहां जो भी था वह अयाँ था

सताती है अब मुझ को वह याद ए माजी
हसीन तू भी था और मैं भी जवान था अब आया है करने को अहवाल पुरसी
अब इतने दिनों यह बता तू कहाँ था .

हयात आज है जिंदगी तल्ख़ अपनी
वह दिन याद हैं जब मेरी जान ए जान था ;

Leave a Reply