ग़ज़ल

क्यों समझ नहीं पाते पापा मेरे
आशियाँ में तुम हो अब बे बाल ओ पर ;

इन फिज़ाओं पर तुम्हारा हक नहीं
जाते हो सेहन ए चमन में तुम किधर ;

तेज़ होगी दिन ब दिन ये दोपहर
मौज दरिया का न होगा अब गुज़र ;

नीम के साए ये देते हैं सदा
चाहिए आराम तो आओ इधर

जिस्म का है खोल मानिंद ए क़फ़स
लौट आओ और संभालो अपना घर

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