दम तोड़ती रही ज़िंदगी रात-भर

दम तोड़ती रही ज़िंदगी रात-भर

बेपरवाह महफ़िलें सजीं रात-भर

 

दंगों में मरते रहे बच्चे-बूढ़े सभी

इंसानियत शर्मशार रही रात-भर

 

थी आज़ादी की सालगिरह जश्ने माहौल भी

झोपड़ियों की मसालें जलीं रात-भर

 

 मै घर भी जाता तो क्या लेकर

उम्मीदें तार-तार हुईं रात-भर

 

सबकी फ़िक्र लिए भटकते रहे हम

लुटा सबकुछ हुई बेज़्ज़ती रात-भर

6 Comments

  1. yashoda agrawal 23/08/2012
  2. sangeeta swarup 25/08/2012
  3. Yashwant Mathur 25/08/2012
  4. Shadab Azimabadi 29/10/2012

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