तुम्हारा चहेरा

तुम्हारा चहेरा

कभी कभी मन की आँखे खोल
देखता हूँ तुम्हारा जब चहेरा
तढपाते बीते जो पल अनमोल
दिखता है सब कुछ अधुरा
अरमान जंहा हुवे सारे गोल
दिखे बिखरा स्वप्न सुनहरा
कभी कभी मन की आँखे खोल
देखता हूँ तुम्हारा जब चहेरा
“घर” बनाने में घिर गई बेमोल
दिखता हैं एक “परिवार” तुम्हारा
“तुम्हे”याद हमारी जरुरत के बोल
दिखता तुम्ही से है अस्तित्व सारा
कभी कभी मन की आँखे खोल
देखता हूँ तुम्हारा जब चहेरा

सजन कुमार मुरारका

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