स्पर्श

यह स्पर्श न अब वो स्पर्श रहा,
यह स्पर्श न अब कुछ स्पर्श रहा …
सच है कवी आपने सच कहा
जीवन की आपाधापी का यह सच रहा…
स्पर्श “जीने का” उस स्पर्श में कंहा
उस “स्पर्श” में ही थी “जीने” की चाह
दोनों “स्पर्श” इस जीवन की है राह
यह स्पर्श है तब भी तो वो स्पर्श रहा,

सजन कुमार मुरारका

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