मैं उस चमन का माली हूँ

मैं उस चमन का माली हूँ
जिसके फूलो पे मेरा आधिकार नहीं

हर फूल नफरत करता है मुझसे
काँटों को भी मुझसे प्यार नहीं

एक एक पौधे को सींच कर
इतना बड़ा बगीचा बनाया

बहार आई तो वहा कोई और था
जो कुछ सोचा था कुछ भी नहीं पाया

जिस समय कोई न था  उनके पास
मेरी जिंदगी का सहारा लिया

और आज जब सब कुछ पा गए वो
मेरे दिल को बेसहारा किया

जरा सी धुप सह न सके
मुरझाते चले जाते

काँटों से किया होता दोस्ती
तो जिंदगी  भर साथ निभाते

ऐसे कोमल लोगो पे रहा न विश्वास
बहुत ही बेवफाई की है’ लोकेश ‘ के साथ

लोकेश उपाध्याय

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