कविताएँ

कामना 

कितनी गहरी रही ये खाई  
मन काँपता डर से
अतल गहराइयाँ मन की
झाँकने का साहस कहाँ
दूर विजन एकांत में
सरिता कूल सुहाना दृश्य कैसा
नीम का वृक्ष
चारों ओर से गहरी खाई
काली सिंध बह रही मंथर
बीहड़ खाइयाँ
परिंदे पी पानी तलहटी का
आ बैठते नीम की टहनियों पर

बड़ी मुश्किल से
हम खाइयों के भय से पीछा छुड़ाते
किलोल करते ये परिंदे
हम को चिढ़ाते
चींटियाँ रेंगती भू भाग पर
समझतीं प्रणियों को भी पेड़ पौधे
चढ़ती और गुदगुदा जिस्म पा
काट लेतीं त्वचा को
किनारे नदी के
भेड़ बकरियों का झुंड
साथ चरवाहा 
नहाता नदी में निश्छल भाव से
निचोड़ पानी कपड़ों से
होता साथ बकरियों के
बादल घिर रहे आकाश में 
अतृप्त हैं ये खाइयाँ

पावस में गहन ताप से
सूखी हैं ये, संतप्त हैं,
जल विहीना हैं
बादलों तुम बरसो यहाँ इतना    
इस धारा को तृप्त कर दो   
नदी काली सिंध पानी से लहलहाए
और ये ढूह
जिसके किनारे बैठा हूँ
आज मैं यहाँ 
इस नदी में डूब जाए
होंगे प्रफुल्लित ग्रामवासी
आऊँगा मैं यहाँ फिर
शिशिर और हेमंत में
हरित वृक्ष और पौधों से भरी
देखना चाहता हूँ मैं
” यह धरा ”
…………..

विवशता

एक लंबी सुरंग
खड़ी प्रेत छाया  
द्वार पर उसके
निकलने का रास्ता नहीं कोई
प्रारंभ में चले थे जहाँ से
धसक कर टूट चुकी
अब सुरंग वहाँ
मुश्किल है पहचानना अँधेरे में
था उसका कैसा और
किस स्थिति में रचाव
छिन्नभिन्न रास्ता पीछे
सामने विकट स्थितियाँ
भयावह आकृति वह
डर पैठा अंतर में सघन
मन और मति दोनों
कर गया अस्थिर
चेतना है शेष इतनी
निकल सकता है रास्ता
सकुशल बच निकलने का
कुछ क्षणों के लिए यदि
हट जाए वह भयंकर आकृति
डरती है प्रेत छाया
जिस आग और लोहे से
दोनों नहीं हैं पास अपने!
………….

परिवर्तन

कई बार    
झुँझलाया हूँ मैं
सड़क के किनारे खड़ा हो
न रुकने पर बस
गिड़गिड़ाया हूँ कई बार
बस कंडक्टर से
चलने को गाँव तक
हर बार
कचोटता मेरा मन
कसमसाता
आहत दर्प से गुज़रता मैं
तेज गति वाहनों से
देखता इंतज़ार करते
ग्रामवासियों को
किनारे सड़क के
नहीं कचोटता मन
न आहत होता दर्प
सोचता
नहीं मेरे हाथ में लगाम
न पैरों के नीचे ब्रेक
नहीं
अब कोई अपराध बोध भी नहीं
मेरे मन में
…………

पेड़ होने का मतलब

समझते हैं लोग क्या
पेड़ से
होने से,उसके न होने से
पेड़ का मतलब छाया,
हवा,लकड़ी,
हरियाली
पेड़ जब सनसनाते
सन्नाटे को तोड़ते
कभी खुद टूट जाते
तूफ़ान से लड़कर
देखते लोग पेड़ वे
आँधी में टूटे हुए
होते हैं कितने लाभदायक
नहीं टूटते तब
टूटने पर
आते हैं अनगिनत काम
घरद्वार, हलमूँठ और बैलगाड़ी
नावघाट,मोटर,रेल,
बक्सासंदूक,कुर्सीमेज़
न जाने कहाँ कहाँ
सोचते हैं क्या हम कभी ?
पेड़ों के स्पंदन
उनके जीवन और मृत्यु की बात
हरीपीली पत्तियों एवं शिराओं में
बहते जीवन रस के बारे में
क्या आदमी के साथ
पेड़ों का संबंध
है मात्र पूजा और उपयोग का
प्रतीक होते हैं पेड़
सतत जीवंतता,उत्साह
और प्रेम के
……….

पुनर्वास

मन होता जब क्लांत
बनती प्रकृति सहचरी
यह तो है सौभाग्य
हिमालयश्रृंग और चीड़
निकट पा जाता
निहारता उत्कंठा,कौतूहल
और ललक से
स्मृतियों के पहाड़ पीछे
बहुत घने
पहुँचते जंगलों में
सागौन
स्काउट बन सीखता
पहचानता जंगल के रास्ते
संकेत से
झरने का बहता
स्वच्छ पानी,
बीच जंगल
मिल बैठ कर खाना
मन में कितना मीठापन !

………..

पहाड़ से नीचे

मालवा की काली माटी
सोंधीसोंधी गंध
खेत में बागड़ काँटों की
चनों के हरेहरे चमोने
बड़े भी रोक नहीं पाते
मन को
बालक तो बालक ही ठहरे
हिमालय आज पास है
कल था विंध्याचल
समय सांप्रदायिक
यदि बड़ी उर्वर ज़मीन थी वह
युगों तक
तब आज रेगिस्तान यह
रेंगता सा
कहाँ से आया
कुएँ का पानी
नालियों में बहता
पहुँचता खेत गेहूँ के
होली के रंग
पकी बालियों के संग
महक भुने दानों की
होरी आई, होरी आई, होरी आई रे
खचाखच भर गई चौपाल
मन का मृदंग बजता मद भरा
कबिरा ने छेड़ी फागुन में
बिरहा की तान
झूम उठा विहान
कितना विस्तृत मन का मान
भूल गए सब
मेहनत, मार और लगान
दूर हुआ शैतान
पर आज हर घर में
हाँडी के चावल
फुदकफुदक फैले
मन भी रेगिस्तान हुआ
छवि खो गई जो
हो गई रात
स्याह काली
नीरव हो गया
वितान   खग,मृग सब
निश्चेष्ट  
दृग ढूँढ़ते वह
छवि खो गई जो
बढ़ रहा
अवसाद तम सा
साथ रजनी के
छोड़ तुमने दिया साथ
कुछ दूर चल के
रह गया खग
फड़फड़ाता पंख
नील अंबर में
भटकता चहुँओर
वह
लौटेगा धरा पर
होकर थकन से चूर
अनमना बैठा रहेगा
निर्जन भूखण्ड पर
अप्रभावित,अलक्ष
……….

जग के व्यापार से समभाव हुए हैं

भाव बहुत बेभाव हुए हैं
दिन तो दिन रातों के भी अभाव हुए हैं

कितने अँधियारे कष्टों में काटे
उजियारे कितने अलगाव हुए हैं

अपने अपने किस्से हर कोई जीता है
औरों के किस्से किससे समभाव हुए हैं

दूर निकल आए जब तक भ्रम टूटे
वक्त बहुत बीता बेहद ठहराव जिए हैं

नहीं कहूँगा दुख मैं इसको
सुख ने भी कितने घाव दिए हैं

भाव बहुत बेभाव हुए हैं
……….

बदलते परिदृश्य !

अब
बहार जाने को है
और टूटने को है भ्रम
याद आने लगी हैं
बीती बातें मधुर
छड़े लोग स्नेहिल
प्रकृति सुन्दर अनंत
बहुत बरसे मेघ
उपहार तुमने दिया
उर्वरता का धरा को
दुख है पावस बीतने का
बीतनी ही थी रुत
आखिर यह कोई
कांगो (ज़ेर) का भूमध्यसागरीय
भूभाग तो नहीं
कि बरसते रहें
बारहों मास मेघ
धुआँ उगलती रहेंगी चिमनियाँ
सड़कों पर अनगिनत मोटर गाड़ियाँ
रसायनों का लगातार बहना नालियों में
भाँति भाँति के कचरे के ढ़ेर हर जगह
विषैली गैसें, जहरीला जल, दूषित भूमि   
आएँगे अब शरद,
शिशिर फिर हेमंत
सघन ताप और
चिलचिलाहट से भरी ग्रीष्म
न रुका यदि विनाश यह
बदलती ऋतुओं के
साथसाथ
बदल जाएँगे परिदृश्य भी !
……….

आतप

फिर फूले हैं
सेमल,टेसू,अमलतास
हुआ ग़ुल मोहर
सुर्ख़ लाल
ताप बहुत है
अलसाई है दोपहरी
साँझ ढले
मेघ घिरे
धीरेधीरे खग,मृग
दृग से ओट हुए
दुबके वनवासी
ईंधन की लकड़ी पर
रोक लगी जंगल में
वनवन भटकें मूलनिवासी
जल बिन
बहुत बुरा है हाल
तेवर ग्रीष्म के हैं आक्रामक
कैसे कट पाएँगे ये दिन
जन मन,पशु पक्षी
हुए हैं बेहाल
…………..

गीत बहुत बन जाएँगे

यूँ गीत बहुत
बन जाएँगे
लेकिन कुछ ही
गाए जाएँगे
कहीं सुगंध
और सुमन होंगे
कहीं भक्त
और भजन होंगे
रीती आँखों में
टूटे हुए सपने होंगे
बिगड़ेगी बात कभी तो
उसे बनाने के
लाख जतन होंगे
न जाने इस जीवन में
क्या कुछ देखेंगे
कितना कुछ पाएँगे
सपना बन
अपने ही छल जाएँगे
यूँ गीत बहुत
बन जाएँगे
लेकिन कुछ ही
गाए जाएँगे
…………

विरक्ति

कदापि उचित नहीं
दिगंत के उच्छिष्ट पर
फैलाना पर
शमन कर भावनाओं का
मनुष्य मन पर
प्राप्त कर विजय
उड़ भी तो नहीं सकते
अबाबीलों के झुंड में
ठहरी हुई हवा
बेपनाह ताप
बहुत सुंदर हैं
नीम की हरीहरी
पत्तों भरी ये टहनियाँ
अर्थ क्या है
पत्तों वाली टहनियों का
न हिलें यदि
उमस भरी शाम
विरक्त मन,
फैल गई है विरक्ति
बगनवेलिया के गुलाबी फूल
करते नहीं आनंदित
यद्यपि खूबसूरत हैं वे
……………

ग्रीष्म : एक कविता

झंकृत होती हैं
नाड़ियाँ
शिराओं का बढ़ जाता है चाप
तापमापी करता दर्ज
तापमान
अड़तालीस डिग्री सैलसियस
कविताऍ होती वाष्पित जल सी
उत्सर्जित होती
स्वेद सी
फूटती मन और शरीर से
फैल जाती है
ब्रह्मांड में
…………

उदासीनता

क्या मुझे पसंद है व  उदासीनता
क्या तटस्थता और
विरक्ति ही है
उपयुक्त जीवन शैली
क्या निष्क्रियता है
मेरा आदर्श ?
थमी हुई है हवा
निर्जन एकांत में
ध्वनि,
नहीं महत्वहीन
न नगण्य और
असंगत

………….

लघु कविताएँ

(एक)
काव्य सृजन 
कंसीव्ह हुआ
कोख में पला
बन विकसित हुआ
नियत समय बाद
तेज हुई
प्रसव वेदना
जन्म हुआ
कविता का

(दो)
सामने पहाड़ का टुकड़ा
जैसे गोवर्धन पर्वत
होगी जब अतिवृष्टि
नाराज होने पर इन्द्र के
उठा लेंगे कृ़ष्ण इसे
एक उँगली पर
शरण पाएँगे समस्त मरुवासी
इसके तले
इस मरुभूमि पर
ऐसा भी होगा कभी
बहुत रोमांचक है यह कल्पना

(तीन)
न कलम हिली
न अमलतास
न बादल हटे
न सूरज उदास
हवा चली
घूमने लगा
एक्झॉस्ट फैन
कुछ हिले पत्ते
कुछ हिली डालियाँ
गाने बजे
गज़लें चलीं
सड़क पर
आवारा गायें चलीं
बुझी बुझी निगाहें चलीं

(चार)
दूर दूर तक
रंग हुए बेरंग
अच्छे न रहे
बिजली भी है
टेलीफोन भी
मोटर भी,गाड़ी भी
अनजान रस्ता
अनजान डेरा
दूर है मंजिल

(पांच)                 
अफ़सोस भी है
आक्रोश भी
असफलता भी है
असमर्थता भी
जो भी है
नीले आसमान पर
बादलों का
पैच वर्क है

(छः)
यही नर्क है
निर्मल बहती कोई
सरिता नहीं है
ये जिंदगी एक जंग है
कविता नहीं है
हायब्रिड
खिले हैं गुलाब
बड़े बड़े
सुर्ख लाल
फिरोज़ी
हल्के नीले
सुगंध नहीं इनमें
जैसे भावनाविहीन
सुंदर शरीर

 

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