युग तेरा है…

उठो वत्स !
सारी रात जागकर तेरी माँ ने
सम्पूर्ण कथा सुनी है तेरे तात से ।
ओ अभिमन्यु !
उठ…चक्रव्यूह तोड़ दे
युग को नव-मोड़ दे
दुश्मनों का नाश हो
दूर…मोह-पाश हो
तुम में लगन हो, जोश हो
ऐ नादान, तुम्हें जरा तो अब होश हो ।
उस गांठ को तू खोल कि रस्सी लम्बी हो जाये
उस गांठ को न खोल कि छिन्न-भिन्न हो जाये
उठो…प्राण तुम में है
आगे…बढ़ो अविराम
असीम साहस तुम में है ।
ज्ञान से हो, विज्ञान से हो,
चाहे निछावर प्राण हो,
कला से हो या बाहुबल से हो
पर न जीत कभी छलबल से हो ।
तू पृथ्वी पर क्या नहीं कर सकता
यदि आत्मबल तुम में हो ।
सर्वत्र  घोर अँधेरा है
करना तुम्हें ही सवेरा है
वह कौन है बली
जो निगल गया दिनकर को ?
यदि तुम चाहो तो सूर्य उगा सकते हो,
बादलों को बरसा सकते हो,
यदि तुम चाहो तो पत्थर को तरल कर सकते हो,
पानी में आग लगा सकते हो,
यदि तुम चाहो तो
पर्वतों पर कमलदल खिला सकते हो,
मृतकों में प्राण फूंक सकते हो ।
तुम ही वह संजीवनी हो,
पारसमणि हो, दधीचिमुनि हो,
हाँ, वह तुम ही हो
जो कभी न रुकते हो, न थकते हो
उस मार्ग के अथक-पथिक तुम ही हो ।
घुट-घुटकर न मरो…न मारो
यह मत कभी विचारो
कि तुम अभी छोटे हो,
कृशकाय हो, असहाय हो
ओ रे…तुम तो शक्तिमान हो,
भीमकाय हो ।
कैसा भय…करो न वृथा जीवन क्षय,
हो निर्भय ।
कौन करेगा तेरा वध
जो टकरायेगा…वह भी जायेगा सध ।
अटूट विश्वास है
तेरी अवश्य विजय होगी
यह काल का निमंत्रण
युग तेरा है ।

 

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