प्रवीण ‘फकीर’ इक नई शायरी

मुफलिसी, लाचारगी , बेचारगी |ऐसी होती है भला क्या जिंदगी ||

काफ़िये बेदम नज़र आते जहां ,कर रही मातम वहां पर शायरी |

रोज़ ढोता हूँ मैं सूरज पीठ पर ,पालता हूँ आग दिल में इक नई |

लोग अब कुछ जागते लगते यहाँ ,जो सियासत में मची है खलबली |

अब तिजारत हो गया मज़हब यहाँ ,या ख़ुदा कैसी इबादत हो रही |

जिस को हमने सर पे बैठाया कभी ,कर रहा वो आज हमसे सरकशी |

लिख गया कागज़ पे अपना हाल तू ,क्या कयामत है तुम्हारी खामुशी |

भूख के मारे को दे तू रोटियां ,फिर सुनेगा वो तुम्हारी शायरी |

फट पड़ेगा ये कलेजा शर्तिया ,दिलजलों से गर करोगे दिल्लगी |

प्रवीण ‘फकीर’

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