वह

खोजते –खोजते मैंने/ उसे उस दिन पा लिया |

मैंने खुशी से हाथ मिलाने की/ कोशिश की

उसने अपनी आँखें /दहक रही भट्ठी की तरह लाल कर ली |

मैंने  गौर से चाहा देखना

उसका रंग बदल चुका था /उसकी आदतें बदल चुकी थी

उसकी प्रकृति और आकृति बदल चुकी थी |

वह,वह नहीं था /जिसे /मेरे हाथों की बनी

जली रोटियाँ मीठी लगती थी

जो बार-बार मेरे गले लगकर

आह्लादित कर दिया करता था

मेरे हाथों को अपनी मुट्ठी में कसकर

शान्ति महसूस किया करता था

मेरी और अपनी अँगुलियों के पोरों को दबाकर

खून का रंग पहचानने की

कोशिश किया करता था |

तब /सारे खून उसे /एक ही रंग के

नजर आया करते थे |

किन्तु आज

मेरा खून उसे बदरंग लगा

उसने हवा में कुछ सूँघा/और मेरे उपर थूका|

मैं चुप रहा /और करता भी क्या ?

उसने कर्कश स्वर में कुछ कहा

निश्चय ही वह कविता नहीं थी ;

उसका खुला मुख मैंने देखा—

चीखती वालाओं का कौमार्य-वध

माताओं के शवों पर /नवजातों का करुण-क्रन्दन

बसों की खाली सीटों पर /खून के छींटे

टूटे –बिखरे सुहाग के /पवित्र चिन्ह

स्कूलों की सूनी देहरी

सशस्त्र नवयुवकों की मुहँ बंधी भीड़ |

मैं खामोश रहा

दीवाल से चिपकी छिपकिली की तरह

प्रश्न के कठघरे में /चिपकने के लिए मजबूर

कि आखिर उसने /जो कभी आदमी था

देवता बनने की जगह /राक्षस क्यों बन गया ?

उसके वे स्वप्न कहाँ चले गए

किसने छीन लिया/उसका मनुष्यत्व

उसकी सभ्यता पर

बिषैले खून के दाँत किसने गड़ा दिए ?

क्यों हर दरवाजे पर

वह खुनी क्रास बनाता चल रहा है ?

प्रकाश के छू जाने से

वह क्यों तिलमिला उठता है ?

मेरी आँखें नम हो गई

मैं वेहोश हो कर गिर पड़ा |

देखा ,वह भी धार-धार /रो रहा था

मेरे कलेजे से लगा ;

उसका कलेजा खाली था

उसके अंदर की ममता /उसका मनुष्यत्व

उसकी देशभक्ति /उसकी संस्कृति

पछुआ हवा में चटककर /अमलतास के बीज की तरह

सुखी जमीं पर गिर चुकी थी

जिन्हें—

मेरे आँसुओं ने हरा कर दिया |

मैंने महसूसा /मेरे कलेजे से निकले

स्नेह-सिक्त-गंध से /धीरे-धीरे उसका कलेजा

भरने लगा था

और वह आदमी के रूप में

फिर से पनपने लगा था |            ७ अगस्त २०१२

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  1. Rana Shekhar 21/08/2012

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