मेरी कविताएँ

सोचा था मैंने
अब नहीं लिखूँगा कविताएँ
टूटन की ,घुटन की /लावारिस आँखों के सपनों की
सामाजिक विवशताओं की /जलती हुई हसरतों की
बुझती हुई विश्वास की /अब नहीं लिखूँगा कविताएँ |
चुनूँगा शब्द व्योम से ,प्रकृति से ,सागर से ,तरु से ,मरु से
सूरज के गावँ बैठ /गढूगाँ—-
मनोहारी मेहँदी-रचे शब्द-चित्र /चाँद की शीतलता से युक्त
जीवन सौंदर्य की परिभाषाएँ /वैसी ही होगी मेरी कविताएँ |

आकाश में उमड़ते-घुमड़ते /काले-काले बादल
कौंधती बिजलियाँ /नव युगल के कोमल तन पर
रिमझिम गिरती फुहारें
तरु की डाली में उगते नए कोमल कोंपल
हल्के जाड़े की मधुर सिहरन
धुँध छटे दिन
चिड़ियों का नीचे उतर /दाना चुगना
गर्मी के दिनों में /समुन्दर में नहाना
कितनी जीवंत होंगी ए कविताएँ
ऐसी ही होंगी मेरी कविताएँ |

भावनाएँ आतुर हो चली /लगा मैं मौसम को बदल दूँगा
मन पर लग रही /अविश्वास ,अनैतिकता और
स्वार्थपरता की काई को
खुरच-खुरच कर दूर कर दूँगा
मवाद भरे जख्मों पर /ठंढे चन्दन का लेप दूँगा
थाप और ताल पर /नाचेगा यौवन
सुर के आगोश में ;
फुदक-फुदक गौरेये-सा
जन-मन को आह्लादित करेंगी मेरी कविताएँ
जनहिताय होंगी मेरी कविताएँ |

किन्तु कहाँ ?
टूटती ही जा रही /विश्वास से घनिष्टता
है हादसों और दंगों से भरी
खबर सुनने की विवशता
बंटती जागीर ही नहीं /प्यार भी है बँट रहा
वह आँसू नहीं खून था /पीती जो रही है माँ की ममता
बारूद की गंध में बैठकर /चीखों और घबराहटो के बीच
कैसे लिखी जा सकेंगी /कोमल-श्पर्श की कविताएँ ?

अलगाव, आतंक , घोटाला
क्षत-विक्षत पहचान और दमन का बोलबाला
बढ़ाएँगी सिसकती शक्तियों का हौसला
छोटे से हृदय में /प्यार के कुछ शब्द लेकर
द्वार-द्वार घूमेंगी मेरी कविताएँ
हाँ ,वैसी ही होंगी मेरी कविताएँ | ०२.०८.२०१२

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