तेरी मंज़िल के पार!

चाहे -अनचाहे
इस दुनिया मे आने के बाद
अब
धधक रहा है ज्वालामुखी
‘उनकी’ अपेक्षाओं का
अरमानों का
और मेरे
अनगिने सपनों का

वक़्त की बुलेट ट्रेन पर
शुरू हो चुकी है
मेरी प्रगति यात्रा

अब बस इंतज़ार है
अपेक्षाओं और सपनों के
ज्वालामुखी के फटने का
जिससे निकलने वाला
फूलों का लावा
अपनी खुशबू की
चपेट मे लेगा
सारी दुनिया को

महकी हुई हवा
बहक कर छूएगी मुझे
और मेरा नाम लेकर
कहेगी
आ ले चलूँ तुझे
तेरी मंज़िल के पार!

[उनकी=माता-पिता की
मैं या मेरी =एक छोटी लड़की जो यहाँ अपनी बात कह रही है ]

©यशवन्त माथुर©

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