जिंदगी ये भी है

जिंदगी ये भी है कि, सीख कर ककहरा
लिख दूँ इबारत, एक मुकम्मल तस्वीर की

जिंदगी ये भी है कि, खाक छान कर गलियों की
जला कर शाम को चूल्हा, तस्वीर देखूँ तकदीर की

हूँ उलझन में बहुत ,जलते चराग देख कर
रोशन हैं अरमां कहीं ;कहीं सिसकते राख़ बन कर

जिंदगी ये भी है कि ,महलों की बदज़ुबानी के साये तले
बगल की बस्ती में, बाअदब गुलाब महकते हैं।

©यशवन्त माथुर©

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