बातों की चासनी में

बातों की चासनी में लपेटा गया है

फिर बार बार हमको लूटा गया है

 जिस पेड़ की छांव मे बैठा था मै

उसी की शाखों को काटा गया है

 वो बुनियाद जिस पर नाज़ था हमें

उन्ही बातों में हमको बांटा गया है

 अपनी ज़रूरतों के खुद ही गुलाम है

ये कैसी आज़ादी से लपेटा गया है

 ‘नादिर’ ईमानदारी का अब ये सिला है

हर एक इल्ज़ाम में घसीटा गया है

 

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