मन की आवाज

कभी कभी सपने में
सुनाई देने वाली बातें
वह चीख,वह आवाजें
चोंकर कर, जाग कर
खोजने लगता हूँ- अपनेमे,
अपना ही वजूद बाहर
अंधेरी रातोमें, अंधेरोमें
सुनाई देती है वह आवाज़
अक्सर किसी के तकलीफ में
असहाय,लाचार, वेबस वक़्त पर
मैं चुपचाप कुछ भी बहाने से
खोजने लगता रास्ता हटने दूर
मेरी संवेदनाओं को मारकर
उनकी पीड़ा भरी आँखों से बेखबर
गहरे अंधेरे दर्द की राहों में
रुदन के सागर में धकेल दिया
जाने-अनजाने, अंजाम से बेखबर
वही आवाज गहरी बेदना मैं
प्रतिध्वनि होकर, घुल मिलकर
आजाती अक्सर फिर रातोंमें
झंकृत करती, घायल करती
छटपटाहट से लगता तब घबराने
जाग जाता हूँ वापस जब मैं
मुझे लगता है वो आवाज़
मेरा भ्रम है,मेरा किया सही था
मन शायेद अघोषित सजा पाने
कतई तैयार न था अपने अंदर,
भागता दूर उस मौन गुहार से
पर कब तब्दील हो जाती चीखें
मेरी ही आवाज़ में,बंद कमरे में
पता नहीं दिखे सपने बनकर
और महसूस सिर्फ मन ही मन में