जीयें कैसे ?

जीना-मरना क्या है
आनेवाला चला जाता
लोट के कब आता ?
यादें भर रह जाती
इतिहास की पाती
बाकी रहता चरित्र बिशेष
यादों के यह अबशेष
मृत्यु अगर प्रश्न जीवन का
ज़िंदगी उत्तर है जीने का
जियो जी भर के,
सुबह होती निशा शेष
डूबा सूरज, चन्द्रमा का प्रबेश
जीओ जी भर के
यह तो है आने जाने का खेल
चंद लम्हे खुशीके
तमाम उम्र के गम सहले
अफ़सोस क्या मरने का
डरकर जीये जिन्दगी
यह भी है कोई जीना
फिर डर क्या मरने का
जिसने मौत को साध लिया
मौत करेगी बन्दगी
जीओ फिर तान के सीना
यह अंत हीन सवाल
मचाये बिन-कारन बवाल

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