मन का वजूद

अन्दर-बाहर की न जाने
दिल एक समंदर गहरा माने
अजब इसके नाप-तौल के पैमाने
पीड़ा फैले जितनी, घाव गहरे उतने
चाहे रखो खुला, चाहे बंद
बाहर का जग हो पसंद-नापसंद
बिन आहट आते यह निशब्द
छोड़ जाते छाप बिन प्रतिबंद
सुन्दर या असुंदर हो बदन
पर कोमल रहता निर्मल मन
धीरे धीरे-सह लेता सभी स्पंदन
हौले हौले बीतता यों ही जीवन
मन का वजूद मरुस्थल सा
इक उम्मीद बसाए रहता
खुद प्यासा रहा इंतिहा तक
वक्त की इब्तिदा से आज तलक
जिससे दर्द की आग बुझ सके
या यूं ही प्यासा, या जले अगन से
हैरत है कि यह ख़ुद भी जानता नहीं
जो बहार दिखता है, वह अन्दर नहीं
कहते है कि मैं होता हूँ,लेकिन नहीं होता
कहते है कि मैं नहीं हूँ,लेकिन ज़रूर होता
सवाल तो बहुत, पर उत्तर न पा सका
बन के तमाशा रह गया बेवस हकाबका

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