औद्योगिक बस्ती

पहाड़ियों पर घिरी हुई इस छोटी-सी घाटी में

ये मुँहझौंसी चिमनियाँ बराबर

धुआँ उगलती जाती हैं।

भीतर जलते लाल धातु के साथ
कमकरों की दु:साध्य विषमताएँ भी

तप्त उबलती जाती हैं।

बंधी लीक पर रेलें लादें माल
चिहुँकती और रंभाती अफ़राये डाँगर-सी

ठिलती चलती जाती हैं।

उद्यम की कड़ी-कड़ी में बंधते जाते मुक्तिकाम
मानव की आशाएँ ही पल-पल

उस को छलती जाती हैं।

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