इन्सान का सच

मज़बूरी है साथ रखना
चाहे हो दिखावे के लिये
या छिपाके हो फर्क देखना
एकांत मन के अन्दर
सच और झूट के बीच
मौल-तौल से नापकर
नफे- नुकशान का सौदा
झूट के आगे,सच बे-असर
अकेला रहता नामुराद सदा
सभ्य, सुलझे बिचार में
महान चरित्र की जरुरत
कठोर असहनीय आधार में
मुस्किल हो बचापाना इज्जत
मानते है “सच”अमूल्य सोना
खतरा है बेसुमार, बे-बुनियाद
तभी चाहते हिफाजत से रखना
डर जाते, नहीं कर सकते
सच के आघात बरदास्त
अंजाम हो सकता है रोना
बिकट समस्या, या नुकशान
या किये हुवे पर पश्चाताप
पाप-पुण्य का फ़साना
जानकर नहीं अजमाते
घृणा के भयसे चुप-चाप
कोशिश करके नहीं अपनाते
मुल्यबान आभूशनो की तरह
संजोते है धरोहर दिल में
लोगों की नजर बचाकर
कहीं ग़ुम न हो जाये
अस्तित्व अपने आप का
डर लगता है हरपल
इसलिये करके दिल में कैद
न माने मन, दिमाग अचल
काम चल जाता सच का
नक़ल गहने रूपी झूट से
करामाती झूटी बनावट का
चतुर-चालाक अल्फाज में
और होशियार सजावट से
दोनों का मिटता अन्तराल
फिर सच-झूट का भेद
यह कोई प्रश्न नहीं बिशाल
इन्सान न तढ़पते, न खेद
संजीदा लोंगों की आत्मा
अजमाये, प्रक्रिया अकारण
चरित्र निर्माण का ड्रामा
थोप रहें है द्वन्द घमाशन
लेकर नीती-बोध का नाम
“सच” तो सत्य है “अनमोल”
झूट ही जब निपटा लेते काम
कियों कोई दे अमृत-बोल
या अनमोल के लगाये दाम
मधु-रस=झूट, तब अमृत समान

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