बेरुखी का दर्द

जब गम का सैलाब मन में
उनेह पाने का जज्बा दिल में
बेरुखी का दर्द बेपनाह सीने में
आँखों के अश्क़ आये नज़रों में
महशुस ना हो तो, न उड़ाये हँसी में

यह समंदर,इतना गहरा क्या बताये
झांको तो, तह न दिख पाये
डुबे जो, उभर ना पाये
हर पल, सदियों से नज़र आये
किस तरह हम-बीती दुनिया को बताये

नाउमीद से उनकी दहलीज़ से निकले
रुके जो, उनके कदम अगर चलें
साथ चलने की आश अगर मिले
साथ उनके चलूँ, चाहे जान भी निकले
कदम से कदम अगर मिले

मिल सकते हैं अगर वह देखे ख्वाब
उनकी जिद है या, झूट-मुठ के बर्ताव
कहदे कि मुकद्दर मेरा है ख़राब
पसंद कियों है उनको खिलता गुलाब
मालूम नहीं काँटों से है इसका शवाब

मेरे जज़्बात ग़लत, हर बात ग़लत
उन्हें शायद छू न पाई मेरी चाहत
मौका इजहार का, न होगी शिकायत
उनका रक़्स का अंदाज़ लगे गलत
फिर भी वह सही, तो मुझे ना दें वक़्त

लाख अच्छा, फूल मगर
खुशबु न बिखरे, न लुभाये अगर
तितलियाँ न जाये जिस डगर
खिलें, और मर जायें बेखबर
कब तलक यह दर्द दबाया जिगर

रोशनी उनको मिल जायेगी उधार
मजे से जी लेंगे वह निर्बिकार
उन्हें न है, न होगा सरोकार
खुद को जलाकर,रोशनी को तैयार
समझे नहीं,मिलेगा क्या ऐसा दिलदार

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