आत्मविवेचना

न जाने लिखने का नशा लगा कैसे
शायद नाम एक बार छाप जाने से
या आसन जरिया ई-मेल प्रकाशन से
कवी बन गया मन ही मन, अपने से
पन्ने भरे जोढ़-तोढ़ की तुकबंधियों से
बिषय बेतुके या घसे-पिट्टे पुराने से
सोचका दायरा छोटा, लिखूँ जैसे- तैसे
बिना सोचे, सर्वश्रेष्ठ बने की चाहत से
चतुर दिमाग चला तेज गती से
लग गया काम पर,खिलवाढ़ छंदों से
गुणबत्ता देखता कोन, चाहिये किसे
दौड़ रहा हूँ दूर वास्तविकता से
लेखन की संख्या अधीक है, भावों से
चतुर कलाकारी और हेरा-फेरी से
सन्मानित हूँ सर्वश्रेष्ठ कवी उपाधी से
ठगा रांह हूँ ,या ,ठग रहां हूँ अपने से
सोचता हूँ सन्मान और प्रतिभा से
करना है चुनाव, पर उठाऊँ किसे
मन कहता है देखूँ दोनों एक दृष्टि से
न जाने दूँ आया मोका हाथ से
दिमाग कहता है झूट के सहारेसे
लम्बा चल नहीं पावोगे बैसाखी से
जब दिख रहे अलग हर कोण से
कैसे बनेगें लोग वेवकूफ दुबारा से
अब कोशिश है,दोनों एक साथ होने से
मिट जाए भेदभाव सम- दृष्टि से
और रोशनी बिखरे सही मर्यादा से
मान मिले तब, जीये अभिमान से

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