कविता मेरी अभिव्यक्ति”

विशुद्ध साहित्यिक सोच-समझ के बीच
जिन मे इतना “सरफ़िरापन” नहीं होता
कवि कहलाने का अधिकार उनहे नहीं देता
जो एक ढंग के कवि में पाया जाता
बात ऊँचा या नीचा दिखाने की नहीं
हालांकि कवि तो संवेदनशील होता
पर संवेदनशील नहीं दिखता
लेकिन अनुभवी और संवेदनशील बिधाएं
इशारों को पहचान, कंहा चुप हो जाये
कवि तो बाहर निकले जगमगाते सूर्य को दिखाता
अब ये आप पर है सूर्य देखें या कवि की उंगली
आपमें सूर्य देखने की नहीं क्षमता जब की
बेहतर हो कि घर में लगी सूर्योदय की छबी
कविता एक सापेक्षिक मुआमला,अपना-अपना
बुरा कह देने से कविता बुरी नहीं हो जाती –
और अच्छा कह देने से अच्छी भी नहीं हो जाती!…
“पसंद अपनी-अपनी,ख्याल अपना-अपना

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