ब्याकुल मन

काहे मन मोरे ब्याकुल तुम अपार
भटके दर-वक्त-दर, चिन्ता भरा संसार
कभी घर की उलझन,कभी संतानों का भार
कभी धन का अभाव, कभी सताये ब्यापार
मान-सन्मान टूटे धरु कैसे धीरज संभार
राग-अनुराग, भय-क्रोध का नहीं पारावार
कभी कलह, कभी अभिमान, कभी प्यार
कभी परम मित्र के साथ दुखदायी तकरार
कभी मिलन, कभी बिरोह की ब्यथा बेसुमार
हार-जीत,शत्रु-मित्र, दमन के लिये तैयार
कभी निराशा, कभी आशा की है भरमार
कभी कंचन-कामनी,कभी धर्म के द्वार
कभी योग, कभी भोग, कभी हो बीमार
सुख की तृप्ती-मृग-तृष्णा जैसी बारबार
” चिन्ता-चिता समान”, दुःख करे बेकार
धीरज धरो,संयम की है परम दरकार
काम -क्रोध- मद -मोह- मत्त का नहीं सार
सब छोढ़, भज मन प्रभु चरण धीरज धार

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