लफ्ज…..

मैं ने मुफ्त का समझ लुटाया बेसुमार
जिस कल्पना के लिये एक लफ्ज काफी था
उसे सो-सो लफ्ज दिये बेकार

परायों की दुनिया बसाई
अपनी तो फ़िक्र नहीं थी
दौलत यह बिना बात परायों में लुटाई

मुझे मालूम न था-लफ्ज घिसते,
मिट जाते, बिखर जाते
छोटा सा एक लफ्ज कितना सताते

मालूम नहीं कब से यों ही चले आते
न जाने लोंगों ने कैसे कैसे संवारा
कितनी तन्हाई, कितना दर्द साथ लाते

यह जो आया,सभी ने स्वीकार होगा
अरमान दिल के सुनाने को
हर दिल ने इसे संदियों से पुकारा होगा

जब मेरी बारी आई, मैं चुपचाप था लाचार
देखता हूँ मेरे पास कोई लफ्ज नहीं
समझाने को “प्रियतम” तुम से हैं कितना प्यार
मैं ने मुफ्त का समझ लुटाया बेसुमार

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