सोच ?

अब थक कर निढाल
अपने किये से बेहाल
बेठ अँधेरे कोने मैं
मकरी सा बुनता जाल
हर धांगो मैं खोज रहा
टूटे हुवे रिश्तों का हालचाल
संध्या की दहेरी पर
डर रहा हूँ सोच आगे का हाल
बूढ़ा होता जिस्म, डगमग चाल
बेअसर है अपनेपन का सवाल
… खुरदुरे हांथोमैं फूटे छाले
थामा था जिन रिश्तों को अकेले
बट गये अब, बन गये निराले
जिनसे बहेता है रक्त, साँझ अकेले
सुबह एकाकीपन से आंसू निकले
बुन रहा हूँ रिश्तों के जाले
बेठ खाली घर के कोने मैं बेहाल
होकर निढाल, सोच अपना हाल

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