बेटियाँ

सुबह उठती हैं

 

उन्हें पता है

अपनी जिम्मेदारियाँ

पूछतीं नहीं क्या करना है

बस लग जाती हैं 

काम में

रोज़ की तरह

सोचतीं नहीं

ठंड है या गर्मी

धूप है या बारिश

बस रोज़ की तरह

लग जाती हैं

सबकुछ सँवारने-संभालने में

उन्हें बचपन से

सब-कुछ मालूम है

न कुछ माँगती हैं

न ज़िद ही करती हैं

उन्होंने अपनी हदें

पहले से

तय कर ली हैं

 

बेटियाँ

पूछने से पहले

बताने को तैयार

माँगने से पहले

समान तैयार

उन्हें पता नहीं है

कर भी पायेँगीं या नहीं

हाँ कोशिश ज़रूर करती हैं

न कर पाये

ख़ुद से

शिकायत भी करती हैं

 

बेटियाँ

अपने लिए

कुछ नहीं माँगतीं

भाई के खिलौनों को छूकर

ख़ुश हो लेती हैं  

अपने लिए माँगने से

डरती भी हैं

 

बेटियाँ

खुशियाँ नहीं माँगतीं

खुशियाँ देना चाहती हैं

ख़ुश रहने से ज़्यादा

खुशियाँ बाँटना चाहती हैं

बेटियाँ

भाई से बराबरी नहीं चाहतीं

उनके साथ

चलना चाहती हैं

उनका साथ

देना चाहती हैं

सबको ख़ुश

रखना चाहती हैं

सबके काम

आना चाहती हैं ।

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