मुझे यह कहना है…रवीन्द्रनाथ टैगोर की “गीतांजलि” का बंगला से हिंदी में अनुवाद

अलविदा !
कहने से पहले
मुझे यह कहना है
जो देखा है, पाया है
अहा ! कितना अनोखा है
ज्योतिसागर में देखा
शतदलकमल खिला हुआ
कर के मधुपान जिसका
जीवन मेरा धन्य हुआ
इस जग के क्रीड़ाघर में
खेल बहुत खेला मैंने
न जाने कब समा गयी
अचिंत्य की धारा मुझमें
अब चाहे तो कर दे
अंत…यदि करना है
जो देखा है, पाया है
अहा ! कितना अनोखा है ।

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