जब नयी-नयी सृष्टि हुई…रवीन्द्रनाथ टैगोर की “गीतांजलि” का बंगला से हिंदी में अनुवाद

जब नयी-नयी सृष्टि हुई
आकाश में तारे विहँस उठे
देवताओं ने गीत गाये
और सभा में झूम उठे,
“अहा ! इस परिपूर्णता में
कितना विशुद्ध आनंद है !”
तभी अचानक कोई रो पड़ा
वीणा के स्वर्ण-तार टूट गये
गीत…एकाएक रुक गये
जैसे कोई तारा टूटा हो !
वे व्याकुल होकर बोले,
“हाँ…वही सितारा सबकुछ था
सारे स्वर्ग का गौरव था
वो…अखंड-आनंद कहाँ है ?
उस दिन से उसकी हररोज
चल रही निरंतर खोज
एक दिन अँधेरी रात में
वे…सितारे मुस्कुरा उठे
आपस में फुसफुसाने लगे,
“यह खोज…व्यर्थ, बकवास है
समग्रता…सृष्टि में व्याप्त है” ।

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