जाग उठे…चेतना…रवीन्द्रनाथ टैगोर की “गीतांजलि” का बंगला से हिंदी में अनुवाद

चिरजन्म की वेदना
चिरजीवन की साधना
ज्वाला बनकर उठे
निर्बल जानकर मुझे
करो नहीं कृपा…ओ रे
भष्म करो…वासना
और विलम्ब न करो
अमोघ बाण छोड़ दे
वक्ष को जकड़े हुए
बन्धनों को तोड़ दे
शंख गरज-गरज उठे
बार-बार इतना बजे
गर्व टूटे…निद्रा छूटे
जाग उठे…चेतना ।

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